वर्ष भर हिन्दी के प्रति उपेक्षा का भाव रखने वाले और हिन्दी दिवस पर उसके प्रति अपने उमड़ते-घुमड़ते नेह-मेघ से सामाजिक संजाल पर प्रेम की धारा प्रवाहित करने वाले हिन्दी सेवियों और प्रेमियों के क्या कहने!
उस दिन तो ऐसा लगता है मानो हिन्दी की इस अविरल धारा में समस्त विश्व आप्लावित हो रहा हो। अपने इन छद्म अनुरागियों की सच्चाई जानते हुए भी हिन्दी फीकी मुस्कुराहट के साथ मौन रह जाती है। पखवाड़े के शोर में साल भर की पीड़ा भूलना उसकी आदत बन चुकी है। वह अपनी आलोचनात्मक दृष्टि बन्द कर जो मिल रहा है उसे ही अपनी क़िस्मत समझकर हँसी-ख़ुशी स्वीकार कर लेती है। स्वीकारने के स्थान पर यदि शिकायत करेगी तो जो मिल रहा है उस पर भी आफ़त आ जाएगी।
काश! कि किसी के भाई और किसी की जान की तरह हिन्दी भी शान से ये संवाद कह पाती, “मुझ पे एक एहसान करना कि मुझ पर कोई एहसान न करना।”
हिन्दी को हमारे एहसान की नहीं अपितु सच्चे सम्मान की ज़रूरत है।वार्षिक दिवस विशेष पर सार्वजनिक प्रदर्शन वाले सम्मान से बेहतर है दैनिक जीवन में हिन्दी का व्यावहारिक उपयोग करना।
जिन्हें हिन्दी नहीं आती उनके अतिरिक्त सबके साथ ई-मेल, संदेश और संवाद हिन्दी में करके देखिए। मैंने कई हिन्दुस्तानियों की अंग्रेज़ीयत की परत को पतला होते देखा है। टंकण की कठिनाई का रोना रोने वालों को भी देवनागरी में लिखने के लिए प्रेरित किया जा सकता है।
अपनी संस्कृति से जुड़कर, अपनी ज़ुबान पर भोजन में स्वाद का कारक बनने वाली निजभाषा का नमक चखकर तो देखिए। हीनता का बोध उन्हें होना चाहिए जिन्होंने अपनी जड़ों को सींचना बन्द कर दिया हो और अपनी टहनियों को कुतरकर बोन्साई बनना स्वीकार लिया हो। हम तो जहाँ रहेंगे वहीं अपनी जड़ों का विस्तार कर लेंगे। वैश्विक बनने के मोह में अपनी देसी पहचान को मत बिसारिए क्योंकि यही आपकी पहचान है।
गौरवबोध के साथ कहिए कि हिन्दी हैं हम 🙏
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