बातें तो बातें होती हैं
घूम फिर कर
निकल आती हैं,
हरियाली में गाती
बंजर में बैठी रहती हैं।
बातें तो बातें होती हैं
आत्मा को जगाती,
स्नेह में रूकी
करोड़ों हाथों को पकड़ी,
आँखों में डूबी
सड़क से संसद तक
आन्दोलन करती,
सत्ता में बैठ
बंशी बजाती हैं।
बातें तो बातें होती हैं
सीमा पर लड़ती,
देशों को झकझोरती
मानव को जोड़ती- बिखेरती,
युद्ध से शान्ति तक
आती- जाती हैं।
धर्म बन धमकाती हैं
स्नेह से सहलाती हैं,
ओना-कोना ढूंढती हैं
गरिमा में चमचमाती हैं।
चड़क धूप सेंकती
कड़क ठंड झेलती,
जिन्दगी को लाती ले जातीं
आदि से अन्त तक साथ रहती हैं।
बातों का वजन होता
पृथ्वी के बराबर,
सभ्यताओं से जुड़ा
संस्कृति में डूबा हुआ।
* महेश रौतेला