हूँ कलयुग में !
मगर ! मुझमे तुम्हारी उपस्थिति केवल स्वार्थभर हो ,
ऐसा मुझे नही लगता मगर ! शायद हो भी ! मुझे मुझसे ज्यादा जानते जो हो तुम ! लेकिन जब सोचती हूँ तुम्हे किस हद तक हो तो वहाँ तक जहाँ मेरा भी अस्तित्व नही | अधिक साहस और सामर्थ्य नही , नही अधिक सहनशीलता | मै टूट सकती हूँ ! मै बिखर सकती हूँ ! तुम्हारी परिस्थिति मे खुद को ढला हुआ पाती हूँ मगर !
फिर भी! किसी भी स्थिति मे तुम से खुद को पृथक नही पाती | जैसे आईना हजार टुकड़े मे भी तश्वीर एक ही दिखाता है |
अन्तस