भरोसा है तो रिश्ता है
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आधुनिकता की आड़ में हम भले बदल जायें
रिश्तों का भरोसा क्या? मन में घर कर जायें
पर पुरातन सोच हो या परंपराएँ
क्या मजाल कि अपने सिद्धांत से तनिक भी हिल जायें।
रिश्तों को संजोना है तो भरोसा करना सीखना होगा
बिना भरोसे के रिश्तों को तगड़ा झटका लगेगा।
रिश्तों को मजबूत रखना है तो
भरोसा करना ही पड़ेगा,
वरना रिश्तों के साथ साथ भरोसा ही नहीं
इंसान भी टूटकर बिखर जायेगा,
तब पश्चाताप के सिवा कुछ हाथ नहीं आयेगा।
रिश्तों कोई भी हो, किसी से, कैसा भी हो
बिन भरोसे रिश्तों का सूत्र हाथ से फिसल जायेगा।
जब रिश्ता ही न बचेगा तब
भरोसा तनकर आपको मुँह चिढ़ाएगा,
आपको जीवन भर टीस देगा और रुलाएगा।
सुधीर श्रीवास्तव
गोण्डा उत्तर प्रदेश
८११५२८५९२१
© मौलिक, स्वरचित