चलो जाना लिया !
कितना जाना तुमने ,
बहुत खूब पहचाना ,
हर एक जगह से निष्कासित कर ,
यह बताने मे तनिक देर न की " जा ! खुश हूँ
मै अपनी दुनिया में अपनो के बीच , जो मेरे है
वो हैं मेरे समीप , खिले चेहरे देखकर तुम्हारे मै
मुरझाई मगर ! वो मुरझाना ईर्ष्या न थी , न ही
शिकायत विशेष कुछ टीस थी अपने ही कर्मो
के परिणाम की खुद से , नाहक ढूँढती ओट मे छिपकर
हर बार अपनी अनुपस्थिति का उत्तर पाकर भी झूठ से
खुद आप ही आपको बहलाती रही | फिर देखती हाथ मे पड़े मुरझाये इंतजार रुपी जर्जर पत्ते को जिसे रख दिया सम्भालकर समय की आलमारी में |
अब उस पत्ते को देख पहले जैसी पीड़ा नही होती ,
शायद हृदय मानने लगा है जो जहाँ है वहीं के लिये बना है
पत्ता भी तो अब हरा नही , कहाँ उसमे जान बची ! | तुमने यूँ ही पकड़ा दिया होगा जिसे अब याद नही , तभी तो ! तुमने खूब समझा मुझे | खैर ! तुमसे अब कोई शिकायत नही हाँ ! बची थी कुछ बूँदे शिकायत की ओस की तरह जो अब शायद सूख रही है धूप के संपर्क मे आकर |
याददाश्त कमजोर है मगर आश्चर्य तुम्हारी बात भूली क्यों नही | यह भी समय को सौप दिया मै याद नही करती केवल याद है |