तुम जानते हो उस राह पर
जाती नजर को जहाँ अब कोई अपना नही |
नही ठौर कोई , कारण तुम ही तो हो |
कई बार सोचा प्रयास किया न देखूँ ,
देखना अर्थहीन जो है , हो भीतर , बाहर भला कौन है|
फिर सोचती हूँ यह तुम्हारी इच्छा हो शायद !
नजरो को संचालित करने की भी प्रेरणा भी तो तुम्ही से है,
कभी सोचती हूँ कि जो हो रहा है वह खिलवाड़ है आखिर क्या भरना चाहते हो मेरे भीतर | कठपुतलियों की डोर तो तुम्हारे ही हाथ है | फिर कैसी बेचैनी ?कैसी उदासी दिख रही है शब्दों में | मुझमे जीवन था तो क्या अब मृत हूँ? मुझमे और तुममे भेद नही यह कौन था ? क्या अब वह अनुपस्थित है मेरे भीतर ? जो था वह सत्य या जो है वह
सत्य ? जिनके पास हो तुम क्या उनमें प्राण नही होंगे ?यदि उनमें प्राण है तो मृत कौन है भला ? कुछ ऐसा है जो तुम्हारी इच्छा के विपरीत हो ? जो कर्ता हो तो परिणाम का बोझ शब्दों में क्यों? आखिर तुम्हारे शब्दों की प्रेरणा कौन है | तुम यदि सत्य हो तो झूठ क्या ? झूठा कौन है ?