किस गम को बेहिसाब करते हो ,
किस खुशी की तुम बात करते हो,
मौत आयेगी , आनी ही है ,
जिन्दगी बद्दुआओं की ही कहानी है|
जिन्दगी अगर यही ,इतनी है तो मृत्यु ही कहाँ बुरी है |
बुरा है तो सोना , चिर निद्रा में आँखे अभी तक खुली नही हैं | जाल बिछा है , पैर फँसे हैं स्वर्णजाल (झूठे सपने) में ,
क्या हैं जीवन क्या जानूँ, मृत्यु को भी न पहचानूँ |
मुक्ति ही है राह यदि तो , आने से पहले क्या मुक्त न थे ?
कैसे आये? बँधे ही हैं क्यों ? जब बंधन पीड़ादायक है |
कर्मजाल मे फँसे सभी तो कैसे?क्यों?कब निर्माण हुआ?
कौन है पीड़ित? कौन सुखी है ? है इसका आभाष किसे?