मेरी आत्मा के भीगे कागज़ पर
बेरंगी स्याही से उतर आए हैं कुछ नाम
जो बिखरते सूरज के समान लाल हैं
और --
मेरे मन ! मैं तुझे क्या कहूँ --
पागल ?बुध्दिमान ?
या --और कुछ ?
हर पल ,हर क्षण
बंद गोभी की भाँति
एक के बाद एक
परत उतरता
तू ---
मेरा असली रूप सामने ले आता है --
ऐसा क्यों होता है कि खुश होते हुए भी हम
कुछ यादों के
धुंधलके को चीरकर
अचानक ही रो पड़ते हैं ----
डॉ. प्रणव भारती