लेखक अपनी रचना में अपने पात्रों की आड़ में उपस्थित रहता है। जिन पात्रों का वह सृजनहार है दरअसल वे उसे अपने भीतर पनाह देते हैं। वह जिस रचना का सृजन करने का श्रेय लेता है, वही उसे अभिव्यक्त करने लगती है। पात्रों का सृजन शब्दों के अनूठे रोमांस जैसा है। काल्पनिक दिखने वाले पात्र, वास्तविक जगत के लोगों की तरह बोलने-बतियाने लगते हैं। ये तथाकथित काल्पनिक पात्र झूठ के पक्के दुश्मन होते हैं। जंग लगी मान्यताओं को शिवधनुष की तरह भंग करके नयी सोच को मिट्टी के शिवलिंग जैसा स्थापित करने का प्रयत्न करना कोई इनसे सीखें। इन पात्रों का सृजन करके लेखक भले पछताता न हो लेकिन रचना की निर्माण प्रक्रिया के साथ-साथ इनके बदलते तेवर और स्वतंत्र व्यक्तित्व को देखकर अपने ही बनाए पुतले पर हैरान जरूर होता है।