औरत की बेफिक्र चाल
धक सी लगती है किसी को
औरत की हँसी
बेपरवाह सी लगती है किसी को
औरत का नाचना
बेशर्म सा लगता है किसी को
औरत का बेरोक-टोक यहाँ-वहाँ
आना-जाना
स्व्छन्द सा लगता है किसी को
औरत का प्रेम करना
निर्लज होना लगता है किसी को
औरत का सवाल करना
हुकूमत के खिलाफ लगता है किसी को
तू समझती है ना ये जाल
इस जाल की तमाम रस्सियां एक ही सूत्र से बंधी हैं
जिसका रेशा-रेशा शक की निगाहों से देखता है तुझे
लेकिन औरत❗
तू चल अपनी चाल कि नदी भी बहने लगे तेरे साथ-साथ