“मैं तुझ से प्यार नहीं करता,
पर ऐसी कोई शाम नही।
जब में आवारा सड़कों पर,
तेरा इंतज़ार नही करता।।
मैं तुझ से प्यार नहीं करता,
अक्सर दिल से ये कहता रहता हूँ।
पर तेरी साँसों में छुपके, साँसे लेता रहता हूँ।।
मैं तुझ से प्यार नहीं करता,
पर शहर में जिस दिन तू ना हो,
ये शहर पराया सा लगता है।
हर फूल लगे बेगाना सा,
हर शजर पराया लगता है।
वो अल्मारी कपड़ों वाली,
लावारिस हो जाती है।।
ये पहनूँ या वो पहनूँ ,
ये उलझन भी खो जाती है।
मुझे ये भी याद नही रहता,
कब दिन डूबा कब रात हुई।।
अभी कल की तो बात है,
जब घंटो तक मेरी दीवारों से बात हुई।
जो होश ज़रा सा बाक़ी है,
वो भी खोने वाला हूँ।
अफ़वाह उड़ी है यारों में,
कि मैं पागल होने वाला हूँ।।” © जतिन त्यागी