तुम में क्या था जो मैंने चाहा,
क्षुब्ध प्यार भी वह नहीं था,
तृप्त ईश्वर भी वह नहीं था,
चाहा-अनचाहा तुम में था।
गरिमा जैसा कुछ अन्दर था,
छूटी जीजिविषा दिखती थी,
जो छुआ तुमने वह मैं था ,
जो छू न पाये वह अनन्त था।
जो जी लिये वहीं स्नेह था
जो जी न पाये वह सपना था,
कहाँ धरूँ अब मन की पीड़ा,
कहाँ राह की उत्सुकता देखूँ ?
तुम में क्या था जो मैंने चाहा,
तुम में क्या था जो मैंने पाया !
**महेश रौतेला
२६.०६.२०१५