प्यार अद्भुत,अचिंत्य
जड़ता से उठाता,
बँधता, ठहरता
मुस्कान का आलोक दिखाता।
चला मीलों मील
प्यार मधुर,
गोद में,वन प्रान्तर में
जब-तब बना मधुर पीड़ा।
ढूंढती है यशोदा माँ
कान्हा को यत्र-तत्र,
सोचती प्यार से बड़ी
कोई आहट नहीं।
बैठी है माँ सीता
वृक्ष के नीचे,
प्यार बना अतिविशिष्ट
वन-वन ढूंढें श्रीराम।
* महेश रौतेला