समय मैं भी हूँ
समय तुम भी हो,
मैं भी बीतता हूँ
तुम भी बीतते हो,
इस बीतने के बाद
फिर मिलते हैं।
यह अद्भुत यात्रा है
जहाँ रंग-बिरंगा मन है
जहाँ सपने बनते हैं,
सपने कटते हैं
सपने मर कर याद रहते हैं।
कोमल प्यार की जड़
इस बीतने को
और भी कोमल कर
आत्मीयता से ऐंठती है।
* महेश रौतेला