रामायण भाग - 11
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कनक - मृग (दोहा - छंद)
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पंचवटी में आ गए, किया वहां आराम।
देख स्वर्ण मृग को कहा,जीव नहीं ये आम।।
रावन ने मारीच से , बोली जा ये बात।
कनक हिरण बनकर करो, राम लखन से घात।।
जन्म मुक्ति उसको मिले, मान गया वो बात।
इसीलिए मारीच ने, किया राम से घात।।
सीता बोली राम से, सुनो ओ प्राण नाथ।
कनक हिरण ला दो मुझे, जोडू तुमको हाथ।।
सुन सीता की बात को, मुस्काये श्री राम।
कहे सिया से राम जी, मुस्किल ना ये काम।।
Uma Vaishnav
मौलिक और स्वरचित