रामायण भाग - 7
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राम - केवट संवाद (दोहा - छंद)
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गंगा तट पर आ गए ,लक्ष्मण, सीता, राम ।
रथ को भेजा अवध में, छुटा अयोध्या धाम ।।
केवट को प्रभु कह रहे, आओ निषाद राज।
नदी पार ले कर चलो, करो राम का काज।।
केवट प्रभु से कह रहे, विनती हो स्वीकार।
चरण धुलाओ राम जी, चले फिर नदी पार।।
लकड़ी की ये नाव हैं, जीवन का आधार।
चरण धूल से आपकी , बन जाए ना नार।।
चरण धूल के आपकी, महिमा बड़ी अपार।
चरण धूल पा आपकी , शिला बन गई नार।।
नाव चला कर चल रहा, मुस्किल से परिवार।
इस कुटिया में राम जी , कहां रखूं दो नार ।।
मंद मंद मुस्का रहे , विनय करी स्वीकार।
पाँव धुला कर ले चलो, हमको गंगा पार।।
केवट पग को धो रहे, किया भाग्य पर नाज।
प्रभु सेवा जो मिल गई, छोडूं सारे काज।।
उतराई के रूप में , मुद्रा दी प्रभु एक ।
उतराई मत दीजिए , पड़ते काम अनेक।।
Uma Vaishnav
मौलिक और स्वरचित