हम प्रेम के खातिर न जाने किन-किन लोगों से उनकी अपेक्षाएं करते हैं ।और जो लोग प्रेम से खुद वंचित है वह आपको क्या प्रेम और लगाव देंगे जो भीतर होगा वही तो बाहर आएगा ना ।अगर तुम किसी से प्रेम या लगाव रखते हो तो वह तुम्हारे भीतर है जिनके अंदर क्रोध, ईर्ष्या, द्वेश है वह क्या प्रेम और लगाव के बारे में जानेगा। जो जिसके पास है वही वह दूसरों में बांटेगा यदि प्रेम है तो प्रेम ईर्ष्या है ईर्ष्या लगाव है तो लगाव करुणा है तो करुणा अंदर जो भी है.. जय द्वारकाधीश 🙏🏻
09:30 AM
28/05/22