“हम मिलेंगे कहीं बाग में, गांव में, धूप में, छांव में, रेत में दशक में, शहर में, मस्जिदों में,
कालिसो में, मंदिर में, मेहराब में, चर्च में, मूसलाधार बारिश में, बाजार में, ख्वाब में, आग में,
गहरे पानी में, गलियों में, जंगल में और आसमान में,
कोनो मकाँ से परे गैर आबाद सैयाराय आरजू में,
सदियों से खाली पड़ी बैंच पर,
जहां मौत भी हमसे दोस्तों गरेबाँ होगी,
तो बस एक-दो दिन कि मेहमान होगी। – © जतिन त्यागी