मुझमे अनगिनत अवगुन है लेकिन,
एक सबसे बड़ा अवगुन है |
यह हृदय पूजता है एकनिष्ठता को |
यह हृदय पूजता है सच्चाई/ईमानदारी को |
यह हृदय पूजता है दृढ़संकल्पी को |
इन सबका आभाव है मुझमे , इसीलिए पूजती हूँ अपने से बड़े शक्तिशाली को यह पूजना ही प्रेम और तपस्या है | यह तपस्या निर्मल जल जो अभिषेक है आषुतोष का और प्रसन्नता है भगवती की ||