पलकों के मोती
कोशिश करू मैं कितनि भि, पर यह कमबख्त आँसू, नैनो में, आ ही जाते है
यह दिलका दर्द जो दबाना चाहती हूं, उसका इज़हार, कर ही जाते है
रोको इन्हें कितनाभि, इन दुखी दो नैनोसे, यह आँसु बन के नीर, बह ही जाते हैं
दिल के भीतर, एक दरिया तूफान उठा रहा है, तो दो बूंद तो, बहार आ ही जाते हैं
दिलके समंदर में छिपे यह क़ीमती मोती, लाख कोशिशों के बाद भी, छलक ही जाते हैं
यहाँ मन की चतुराई नहीं चलती, यहां दिलपर कोई ज़ोर नहीं चलता, यह उमड़ ही जाते हैं
आखिर हार मान ली है मैंने, अब कोई उपाय नही है तो, यह मोती पलक से गिर ही जाते हैं
Armin Dutia Motashaw