हमदर्द भी बनी,
औरों की तरफ से दिए हुए दर्द को पी गई
लफ्जों के शोर से नहीं दफन हुई
मेरी खामोशी खुशनुमा माहौल बरकरार करने के लिए मसरूफ हुई
रूहानी है इसकी अदा ,
ना समझना इसे "की मिली है मुझे कोई सजा"
रजामंदी कर खुद से जशन में भी होठों को सी रखती है
महंगे जज्बातों को अपने यूँ ही बयां नहीं करती है
कदर करती है औरों के लफ्जों की
रंजीशो को काट , हल्की सी मुस्कान दिलों में दरारे भर्ती है
लफ्जों से नहीं आँखों से बात कर
लबों को बांध तहसीब दिखाती है मेरी खामोशी
deepti