प्यार के लिए:
मैं नियमित रूप से वर्षों से दूरदर्शन पर रंगोली देखता हूँ। आज एक गाना आ रहा था-
"प्यार के लिए
चार पल कम नहीं थे,
कभी हम नहीं थे,
कभी तुम नहीं थे...।"
दस साल में तकनीकी परिवर्तन इतना अधिक हुआ है कि चिट्ठी का अस्तित्व लगभग समाप्त होने को है।संचार माध्यम इतने त्वरित हो गये हैं कि संवेदनाएं सिमट सी गयी हैं।हाय,पर मिलते हैं और हाय, पर ही विदा हो जाते हैं।बचपन में महिलाओं को प्यार से गले मिलते देखता था। वे गले मिलते समय कहते थे," भ त्ते भलि ह र छे (बहुत अच्छी हो रही है।)। इस बीच अलग समाचार भी मिलते हैं। कल अखबार में पढ़ा कि चीन में एक पति बर्षों से अपनी बिस्तर पकड़ी बिमार पत्नी की सेवा और देखभाल कर रहा है। पति की अभी उम्र चौरासी साल है। उसकी पत्नी जब बीस साल की थी तब उसे कुछ ऐसी बिमारी हो गयी थी कि वह असहाय हो गयी थी।पति तब खान में काम करता था। उसनेअपना काम छोड़, पत्नी की देखभाल में अपना जीवन लगा दिया।
मेरे पड़ोस में बूढ़े पति-पत्नी रहते हैं। लगभग पचहत्तर साल उनकी उम्र होगी। पत्नी लगभग अंधी हो गयी है। बच्चों को उनकी कोई चिंता नहीं है। एक ही शहर में सब रहते हैं। आधुनिक जीवन की भाग-दौड़ में सब व्यस्त हैं। **पत्नी, पति से पूछती है," तुम्हें कुछ हो गया तो मेरी देखभाल कौन करेगा?" पति के पास कोई उत्तर नहीं है सिवाय एक दूसर को टकटकी लगाकर देखने की मुद्रा के।
फिर यह सब लिखते-लिखते मैं गुनगुनाता हूँ-
"प्यार के लिए
चार पल कम नहीं थे,
कभी हम नहीं थे,
कभी तुम नहीं थे...।"
* महेश रौतेला
** पत्नी का ३ साल पहले देहान्त हो गया है।