Hindi Quote in Microfiction by Yayawargi (Divangi Joshi)

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मेरे रजत वर्ष को अभी चार महीने शेष है ,
कुछ नया करने का मन तो होता है
पर मन नहीं करता ।
मेरे एक दादा थे वो हर बार एक बात बताते थे ।
उनके सहकर्मि से इस बरस किसकी हुई बरसी गिनाते थे।
अपनी बारी आएगी जल्द वो भी सोचा करते थे ।
एक ऐसी टीस हलक मे अटकी पड़ी है !
हर नई तक पे आँखो ने बुने थे सपने
मेहनत कि थी साथ भी थे हर अपने
दिल लगाया के हाथ चलाए थे
कुछ पाया था कुछ दूर पेर चलें थे

पर अब कुछ नया चाहिए नहीं
क्योंकि अब आँखो को कुछ नया लगता हि नहीं
जैसे इन चन्द सालो मे सब देख रखा हो
आसमानी बुलंदी व बर्बादी कि गंदकी !
राज रमत के हर दाव हर चाल
हर खेल हर मात ।
अब एक स्वीकृति आ गई है मन मे
जो है अच्छा है , जो चला गया अच्छा था ,
जो होगा अच्छा ना हो तो भी क्या?


चाह तो आज भी चाँद छू ने कि है हि
पर वो जमिन पे आई तो अब हाथ मेने उठाने नहीं।

पर चाँद तो फलक से नीचे आई नहीं
बस तो इस बात को भी स्वीकृति है


@यायावरगी

Hindi Microfiction by Yayawargi (Divangi Joshi) : 111766347
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