तेरी आरजू ना ही तेरी ख्वाहिश रही
अब ना तेरी आरज़ू, ना ही तेरी ख्वाहिश रही
मुझमे अब ज़रा सी भी.. ना गुंजाईश रही
दमकते थे हम कभी, ऐसे हसीं भी थे मंज़र
हुआ कुछ ऐसा की अब मुझमे ना नुमाइश रही
बिछड़ कर फूल बहुत रोये अपने शाखों के लिए
आसुओं के सैलाब में कहा कोई फर्माइश रही
अपने ही दायरे में बंध कर रह गया हुँ मैं
अब किसी को आजमाने की ना पैमाइश रही
उसकी गली से गुजरना अब कभी नहीं होता
पता है मुझे अब वहां कोई.. ना रिहाइश रही
वक़्त के थपेड़ों ने ऐसे किनारे लगाया निराला
अब तो खुद से भी कहां मेरी आजमाइश रही
Sanjay Ni_ra_la... ✍️✍️✍️
26 Nov 2021#2053