की यूँ तो अब मैं दे देती हूँ भावनाओं को शब्दों का रूप,
पर कई मर्तबा
कुछ चीज़ें महसूस होकर भी लफज़ों में ढालनी नहीं आती।
वो तो शुक्र है उस रब्ब का की उसने हमें ये कलम थमा दी,
मेरा लिखा तो पढ़ते हैं कई
कोई पढ़ ले हमें तो ठीक
वरना हमें तो अपने मन की बात भी बतानी नहीं आती।।
-श्रुति शर्मा