शीर्षक : बिचारी शर्म
"शर्म "हुई
अपनी कमजोरियों से
शरमसार
समय को किया
अंतिम नमस्कार
ली लम्बी साँस
चली गई
जगत के विधाता के पास
शर्म के जाने पर
बेसहारा हुई दुनिया ने
न की कोई हलचल
मान लिया विधि का विधान
इँसान तो स्वयँ ही महान
"बेशरम "को हुआ आभाष
जगत पर अब उसका शासन
उसने दिया खुला बयान
"शर्म"मेरी बहन चली गई
मुझे अकेला कर गई
रास्ते अलग हो हमारे भले
पर साथ साथ सदा रहे
हर मन पर राज करते रहे
आप का दिमाग, मेरे अनुसार
सदा चलता रहे, मस्त रहे
आगे भी सेवा करता रहूँ
मुझ पर कर के विश्वास
दीजिये, दिमाग में प्रवास
लीजिए जीवन- आनन्द
भूल जाइए सँसार- प्रबंध
अब अच्छे-बुरे का, ज्ञान से
कोई भी नहीं है, सम्बन्ध
पर हालात कह रहे
अब "बेशर्म" से
दुनिया नहीं चल सकती
आज नहीं तो कल
फिर "शर्म" आयेगी
अज्ञानी"बेशर्म" से पैदा हुई
बेशर्मी अब ज्यादा नही चल पायेगी
✍️ कमल भंसाली