गम के मारे जो मुस्कुराएं हैं
आंसुओं को भी पसीने आए हैं
क्या बला है ख़ुशी खुदा जाने
हम तो बस नाम सुनते आए हैं ।
मेहेरबानी, खुलूस, हमदर्दी
हमने क्या क्या फरेब खाएं हैं ।
हाय रे उनकी याद का आलम,
मैं ये समझा के खुद वो आये हैं ।
फासले और बढ़ गए हैं
जब कभी वो करीब आये हैं ।