उससे मिलकर आयी मैं
फूलों सा मुस्कुरायी मैं
छू कर उसके बदन को
सारी खुसबू दे आयी मैं।
बड़े दिनों से उदास थी ओ
पतझड़ सी अहसास थी ओ
कुछ मीठी मीठी यादों संग
सारा बसन्त दे आयी मैं।
सन्नाटे वाली रातों में
थोड़ा सोर कर आयी मैं
देखे भी कुछ इस तरह
चाँद- चकोर हो आयी मैं।
-रामानुज दरिया