आज सुबहा से तलाश कर रहा था शांती की, सोचा कहीं तो मिल ही जाएगी। गली गली घुमा मोहल्ले छान मारे, शहर का चक्कर लगा आया पर शांति कहीं नहीं मिली।
थक हार के वापस घर आ गया। अभी सोफ़े पर बैठा ही था कि पास ही में बैठी माँ ने आवाज़ दी "शांती ले चाय ले ले"
मैंने चौंक कर देखा तो शांती, जो हमारे घर काम करने आती है, माँ की आवाज़ सुन कर भीतर से आई ।
मैं सोचने लगा "उफ़्फ़... शांती तो हमारे भीतर ही थी और मैं उसे बाहर न जाने कहां कहां ढूंढता रहा। और मैं ही क्यूं ? सभी यही तो करते हैं ! शांती को (काम करने वाली बाई नहीं 😀) न जाने कहां कहां ढूंढते रहते हैं, जबकि वो तो हमारे भीतर ही कहीं है।
विश्व शांती दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं सभी को
-R.KapOOr