भावनाओं का खेल
भावनाओं का खेल
खत्म हो जाती हैं भावनाएँ
कहना कठिन तो नहीं
और जीना...
पर जी रहे हैं
चल रहे हैं, साँसों के सँग
कहीं लकड़ियों की सेज पर
सोया हुआ है कोई
और उसको
जिंदा ही जलाया जा रहा हो।
नहीं नहीं अभी मरा नहीं है
यह कैसा जुल्म हो रहा है
यह कैसा दस्तूर,
यह कैसी दुनियादारी?
पर ऐसा होता आ रहा है
भावनाओं को मार कर जीने वालों
की जीवन-शैली
होती है संघर्षमयी
और बन सकती हैं
कभी किसी के लिए अनुसरणीय भी