नादान
जब वे मंत्री थे तब
बडे बडे ठेकेदार और उद्योगपति
उनके दरवाजे पर संतरी थे।
जनता चरण छूकर करती थी नमन्
और उन्हें कहती थी भगवन्।
मंत्री बनने से पहले
वे ड्राइवर थे, ट्रक चलाते थे,
अब वे मालिक हो गए थे
ट्रक चलवाते थे।
लेकिन समय ने उनके साथ दगा किया
उनके प्रतिद्वंद्वी ने, उनको खिसकाकर
उनका मंत्री पद हथिया लिया।
उन्हें नमन करने वाली
जनता गायब हो गई।
मोहल्ले की जमादारन भी
उनके लिये साहब हो गई
स्टेशन का कुली भी करने लगा मोलभाव
टैक्सी वाला कहने लगा
प्री-पेड पर पैसे चुकाओ।
उनकी कोठी पर अब
उनका दरबार सूना था
जहाँ पुतता था नैरोलैक,
वहाँ पुत रहा चूना था
उनके लिये यह झटका बडा था
दरवाजे पर स्वागत के लिये
केवल उनका कुत्ता खडा था।
सब उन्हें बेईमान बता रहे थे
जो कल तक भगवान बताते थे
वे भ्रष्ट बताकर हंसी उडा रहे थे।
वे बहुत व्यथित थे
इस अनादर और उपेक्षा से,
सोचते थे कैसे निकले
इस विकट परीक्षा से।
उनके पुराने अनुभवों ने उन्हें रास्ता दिखाया।
उन्होने अपने आपको जमीन और
मकानों के धंधे में लगाया।
लाखों को करोडों बनाया।
जो दूर हो गये थे
वे फिर पास आने लगे
जो करते थे निंदा
वे प्रशंसा के गीत गाने लगे।
उनका दरबार फिर सजने लगा
उनके दरवाजे पर राजनीति का
बाजा फिर से बजने लगा।
किस्मत ने फिर जोर लगाया
उनको पुनः मंत्री बनाया।
वे हो गए जनता के
और उनकी हो गई जनता।
जनता बन गई भक्त मंडली
वे बन गए महन्ता।
फाइलों पर फिर वजन आने लगा,
और वजनदार लोगों की फाइलों को
तेजी से निपटाया जाने लगा।
आज राजनीति में नेता
कुर्सी पर है तो भगवान है
और कुर्सी से उतर गया
तो बेईमान है।
जनता कल भी नादान थी
आज भी नादान है।