शहर और सडक
शहर की सड़क पर
उड़ते हुए धूल के गुबार ने
अट्टहास करते हुए मुझसे कहा -
मैं तुम्हारी ही भूल का परिणाम हूँ।
पहले मैं दबी रहती थी
तुम्हारे पैरों के नीचे सड़को पर।
पर आज मैं मुस्कुरा रही हूँ
तुम्हारे माथे पर बैठकर।
पहले तुम चला करते थे
निश्चिन्तता के साथ
शहर की प्यारी-प्यारी
सुन्दर व स्वच्छ सड़को पर।
पर आज तुम चल रहे हो
गड्ढों में सड़कों को खोजते हुए
कदम-कदम पर संभल-संभल कर।
तुमने भूतकाल में
किया है मेरा बहुत तिरस्कार,
मुझ पर किए हैं अत्याचार,
अब मैं उनका बदला लूंगी,
और तुम्हारी सांसों के साथ
तुम्हारे फेफडों में जाकर बैठूंगी।
तुम्हें उपहार में दूंगी
टीबी, दमा और श्वांस रोग।
तुम सारा जीवन रहोगे परेशान
और खोजते रहोगे संस्कारधानी की पुरानी
स्वच्छ, सुन्दर और साफ सड़कों को।