संस्कारधानी
आँखों में झूमते हैं वे दिन
हमारे शहर में
गली-गली में थे
साहित्य के सृजनकर्ता,
संगीत के साधक,
तरह-तरह के रंगों से,
जीवन की विविधताओं को
उभारते हुये चित्रकार,
राष्ट्र प्रेम से ओत-प्रोत
देश और समाज के उत्थान का
पोषण करने वाले पत्रकार
साहित्य, कला, संस्कृति और समाज के
सकारात्मक स्वरूप को
प्रकाशित करने वाले अखबार
और थे इन सब को वातावरण और
संरक्षण देने वाले जन-प्रतिनिधि।
जिनकी प्रेरणा और प्रोत्साहन में
नई पीढ़ी का होता था निर्माण
पूरा नगर था एक परिवार
और पूरा देश जिसे कहता था संस्कारधानी।
सृजन की वह परंपरा
वह आत्मीयता और
वह भाई-चारा
कहाँ खो गया ?
साहित्य, कला, संगीत और संस्कार
जन-प्रतिनिधि, पत्रकार और अखबार
सब कुछ जैसे
ठेकेदारों का कमीशन हो गया।
हर तरफ
डीजे और धमालों की
कान फोडू आवाजों पर
भौंडेपन और अश्लीलता के साथ
कमर मटका रही है नई पीढ़ी।
आम आदमी
रोजमर्रा की जिन्दगी,
मंहगाई
और परेशानियों में
खो गया है
सुबह से शाम तक
लगा रहता है काम में
कोल्हू का बैल हो गया है।
साहित्य-कला-संगीत की वह सृजनात्मकता
उपेक्षित जरूर है पर लुप्त नहीं है
आवश्यकता है उसके
प्रोत्साहन और उत्साहवर्धन की।
काश कि यह हो पाए
तो फिर से हमारा नगर
कलाधानी, साहित्यधानी और
संस्कारधानी हो जाए।