ख्वाब मेरे कुरबत से जलाने के लिए
वो लौटा था फिर से दूर जाने के लिए
हमने सोचा हथेली में आ गिरी किस्मत
कहा मालूम था ये तरकीब है आजमाने के लिए
ना बारिश न हवाओ की जरूरत थी कोई
इक जूठी आस ही काफी थी बुझाने के लिए
फिराक में थे हम हँसने की इस बार यारो
फकत इक याद ही काफी थी रुलाने के लिए
खैर टूटे हुए कोई क्या जुड़ने की ख्वाहिश
महज इक अब चाहिए दोबारा भुलाने के लिए
शिकवे तो है कई मगर नफरत कोई नही
हमने इश्क बाकी रखा फिरशे बुलाने के लिए
-Pradip Gajjar