ऐसा कब तक और चलेगा
गद्दारों से देश पलेगा।
आवाजे दाबी जायेंगी
कमजोरो का मौन बढ़ेगा।
ऐसा कब तक और चलेगा।
सांसों में कितनी धूल भरी है देखो ना
संसद में कितनी है अशांति कुछ फेको ना
टूटेगें जब कांच तो कुछ संभव होगा
जनता की आवाज का फिर अनुभव होगा
जन्म जन्म भर तानशाही की अब सेवा कौन करेगा।
ऐसा कब तक और चलेगा।
एक मजदूर है वो कितना मजबूर है
पत्थर के चूरे जैसे वो भी चूर चूर है।
खाने को अन्न नही,जल भी अब दूषित है
घर है टपक रहा,मन भी अब क्रोधित है।
दात टीस कर खुद को शांत कर रहा है
सोचता है खुद को और कोसता है किस्मत को
रोजमर्रा की जिंदगी को वेदांत कर रहा है।
देश की अनेक परिष्ठितीया है जिनसे हर दिन गुजरता हुआ करोड़ो मन कुछ की ठीक है और कुछ बेमन।
अस्पताल है लेकिन बेड नही
मरीज है लेकिन उनकी तकलीफ को देखता कोई नही
क्योंकि उनकी जुबान बंद है।
गूंगे होने से वो और भी तंग है।
धर्म जाति मार काट
सब कुछ सिखाया जाता है।
लेकिन जिसकी जरूरत है वो बस नही है।
विद्यालय है परंतु शिक्षा नही है।
जिससे कलात्मकता आ सके
रुचि बढ़े ,जानकारी बढ़े
शिक्षा के रथ की सवारी बढ़े।
अर्थव्यवस्था की अलग विवशता है।
सच में भी सच कहूं देश की हालत बहुत खस्ता है।
जनता बेहाल है, नेता खुशहाल है।
जनता के वोट से वो मालामाल है।
प्रत्येक वस्तु त्रस्त है, नकली है,बदनाम है
लेकिन नेताओ को वोट मिल गया न, अब जनता से क्या काम है
अरे मूर्खो आवाज तो उठाओ , सभ्य सुरक्षित और सुसज्जित माहोल का बिगुल बजाओ
अन्यथा अपनी गरीबी को मत कोशो अपने मत के बारे में सोचो कितना महंगा निकला वो
होता अमीर तुम जिसको भी दो
तुम्हे फसाया जा रहा है
धर्म, और फरेब में तुम्हे जुझाया जा रहा है।
मानो और शुरू हो जाओ सबके सब आवाज उठाओ