खोल दो अनन्त तुम
अनन्त में विश्वास है,
रहूँ चाहे बूँद सा
समुद्र में विश्वास है।
रहूँ चाहे कण सा
पहाड़ में दृष्टि है,
रहूँ चाहे बीज सा
वृक्ष में विश्वास है।
रहूँ चाहे तीर पर
बहती नदी ही लक्ष्य है,
रहूँ चाहे राह पर
अनन्त दिशा का विश्वास है।
* महेश रौतेला