एक भिखारी
एक भिखारी मैला कुचैला
दीन भाव से आया।
मेरे सामने हाथ फैलाया।
जेब से कुछ निकालते निकालते
मैं उससे पूछा बाबा !
तुम अन्ना या प्रधानमंत्री को जानते हो ?
वह बोला - बाबू जी।
मैं तो सिर्फ रोटी और कपडे को जानता हूँ।
जो मुझे कुछ देते है
और जो कुछ नही देते है
उन दोनो के लिये दुआ माँगता हूँ।
मैंने फिर पूछा, क्या तुम्हें पता है ?
विदेशो से काला धन वापिस लाने के लिये
और भ्रष्टाचार मिटाने के लिये
चल रहा है एक बडा आंदोलन।
वह बोला- मैं तो केवल जानता हूँ
अपने शरीर को ढंकने वाले
इन फटे कपडों को
और जेब में पडे कुछ पैसों को
मैं क्या जानूँ -
कालाधन, भ्रष्टाचार या आंदोलन।
मैं कल भी भिखारी था आज भी हूँ
और कल भी रहूँगा।
टुकडे टुकडे बासी रोटी,
कट फटे कपडे और टूटा हुआ छप्पर ही
मेरी संपत्ति मेरा धन है।
ये तो बडों की बातें है काला धन आएगा
तो इन्ही में बंट जाएगा।
गरीब, गरीब ही रहेगा
उसका जीवन तो
रोटी और पानी में ही कट जाएगा।
मैं सोच में पड गया
क्या विदेशो में पडा
कालाधन आने पर ही
गरीब का पेट भर पाएगा।
क्या अभी हमारे पास नही है
इतना धन और सामान,
जिससे हर नागरिक को मिल सके
जीने लायक रोटी, कपडा और मकान।
मैंने अपना हाथ जेब से बाहर किया।
जो कुछ हाथ में आया
वह उसे सौंप दिया।
वह दुआएँ देता हुआ आगे बढ गया
और मैं देश के भविष्य पर
सोचता हुआ अपनी जगह पर
खडा रह गया।