सजल
भ्रष्टाचारी कभी न डरता ।
अपने घर की कोठी भरता।
पेंशन वेतन सब है मिलता,
तानाबाना फिर भी बुनता।
सरकारी कुर्सी पाकर के,
नैतिकता की कभी न सुनता।
जितनी बड़ी पोस्ट होती है,
उतनी ही वह जेबें रखता।
नेता पर उँगली हैं तनतीं,
जनता को बस यही है डसता।
बदल गईं सरकारें कितनी
भ्रष्टाचार कभी न हटता।
जब कोई आवेदन देता ,
पर कागज है कभी न बढ़ता।
कितने सारे लड्डू खाता ,
खाना इनका पूरा पचता।
बड़े प्रबल भ्रष्टाचारी हैं,
हर देशों की यही विवशता।
मनोज कुमार शुक्ल मनोज
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