शीर्षक: ख्याल
किस रात का, ये ख्याल कहूँ
हर रात में, याद उसकी है
जीना, बिन उसके, क्या जबाब दूँ
साँसों की, मजबूरी है
कलम वफ़ा की, अब नहीं चलती
शिकवों की स्याही से, लिपटी रहती
कल गुजरी शाम , अब तन्हां रहती
वो न आएंगे, ना उम्मीदी यही कहती
मायूस हो ख्याल, पूछते सवाल
किसी के लिए, क्यों इतना मलाल ?
सितम तुम पर कोई ढाये
तो क्या हम, कभी न मुस्कराये ?
कैसे समझाता, इश्क में डूब जाना होता
यार न हो बाहों में, मर जाना अच्छा लगता
तुम तो एक ख्याल, तन्हाई में ही आते
अगर वो आ जाते, तब तुम तो नही आते
प्यार रंजिशों का, कोई खेल नहीं, जो खेलता
ख्याल उनका, तुम्हारा ही तो सम्मान बढ़ाता
✍️ कमल भंसाली
-Kamal Bhansali