मरा हुआ कुछ तो मिला है
बहुत चला,थका भी बहुत,
नदी से मिलने, नदी भी चली
संगम पर कुछ टूटा हुआ है।
सृष्टि से कुछ छूटा हुआ है
दृष्टि से कुछ छिपा हुआ है,
बनने-बिगड़ने का सिलसिला चला है
मरा हुआ बहुत- कुछ मिला है।
सुख अपना बदलता रहा है
जागने का सिलसिला, टूटता रहा है,
कहा हुआ अनकहा हुआ है
जनमा हुआ बहुत-कुछ मरा है।
** महेश रौतेला