" गजल "
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इश्क सफर है चलता रहेगा , उसकी मंजिल कोई नही ;
कांरवा बने या ना बने भले , चाहे सामिल कोई नही ।
इश्क पर है पंच तत्व से , विश्वास अभिन्न है उसका अंग ;
सांसे रूकती नहीं , थकता नही , उसके मुकाबिल कोई नही ।
प्यार बरसाता है इश्क से , पतझड़ का मौसम भी ;
बसंत भी खिल खिल जाती है , उदास दिल कोई नही ।
इनकार लब्ज आता नही , इश्क ऐसी किताब है ;
सब साकार हो जाता है , काम मुश्किल कोई नही ।
" Bन्दास " बसर कर लेना , इश्क को साथ रखकर ;
इश्क डूबता नही तैरता है , उसका साहिल कोई नही ।
✍️ " Bन्दास "
राकेश वी सोलंकी ।