आइने में ही टूटने का अरमान आया
फिर भी पत्थरों के सर इल्जाम आया।
नापी बहुत रियासत-ए- जमीन हमने
फिर भी हिस्से मेरे समशान आया।
बंटवारे में तो सब बाहर निकल गये
मेरे हिस्से गांव का पुराना मकान आया।
चाहत में भी उसकी अपनी शर्तें थी
इसलिए मैं छोड़ उसका जहान आया।
लिखा था खून से जो प्रेम पत्र कभी
मिलकर मैं ही अजनबी इंसान आया।
अब आंकलन क्या खोने और पाने का
डुबा कर मैं अपना खानदान आया।
-रामानुज दरिया