" गजल "
जब से वो गुजरे इधर से ;
खुशबू आने लगी घर से ।
पीछे मुड़ के जब देखा उसने ;
घायल हो गया एक नजर से ।
बस , आती रही याद बाद में ;
जो बीती वो घड़ी की असर से ।
रोज बैचेन बेकरार मै बैठा रहा ;
नींदे चुराली उसने आंठो प्रहर से ।
"Bन्दास" क्या बिता कया बताऊं हाल ;
किसी को कुछ नही कहा डर से ।
✍️ " Bन्दास "
राकेश वी सोलंकी