#पंखुरी पंखुरी मन
4) सपने
कौन नहीं चाहता..??
आकाश की ऊंचाइयों छूना,
मैंने भी कोशिश की,
पर उड़ान ऊंचाई तक न जा पाई,
पांव में डाली गई बेड़ियाँ,
ये मैंने नहीं अपनाया,
ये डर जमाने का,
ये डर समाज का,
अतः पाँव में डाली गई बेडियाँ,
फिर चाह कर भी उड़ ना पाई..
खुले आसमां में पंख खोल ना पाई ।।
कौन नहीं चाहता..??
फूलों की तरह खिलना,
मैंने भी कोशिश की,
पर कली फूल बन न पाई,
खुशबू कहीं उड़ ना पाई,
पंखुड़ियां बिखर गई..
यह मैंने नहीं किया,
ये ख़ौफ जमाने का,
समाज का,
अतः पंखुड़ियां मसल डाली गई..
फिर चाह कर भी खिल ना पाई।।
कौन नहीं चाहता...??
सपनों को पूरा करना
मैंने भी कोशिश की,
पर सपने पूरे हो न पाये,
टूटे टुकड़े मेरे हिस्से आये,
ये मैंने नहीं अपनाया..
जमाने ने सिखाया,
ये झिझक जमाने की,
ये झिझक समाज की,
अतः सपने तोड़ डाले गये।।
फिर चाह कर भी सपने न देख पाई..
कौन नहीं चाहता..??
सपने देखना
मैंने भी कोशिश की,
कौन नहीं चाहता..??
आकाश को छूना
कौन नहीं चाहता..??
फूलों सा खिलना,
कौन नहीं चाहता..??
सपने देखना, मैंने भी कोशिश की..
🌹सुमन कुमावत🌹