रिटायर्ड हूँ मैं, घर पर बहू देख कर कुढ़ती है।
खूंटी पर टंगी कमीज की रोज जेब ढूढ़ती है।
पोता कहता है रोज़ दादू आइस क्रीम खिलाओ न।
टीचर पीटेंगी मुझको फिर कल नई ड्रेस दिलाओ न।
परेशानियों से भरा हूँ फीका हर त्योहार है।
रिटायरमेंट के बाद साहब दो रोटी की दरकार है।
प्रोविडेड फंड भी निकाल लिया बड़ी बेटी की शादी में।
ताकि वो हँसती रहे खुशहाल रहे जिये वो आजादी में।
बेटा बे रोजगार है बाप पर रौब जमाता है।
दिन भर गायब रहता है रात को पी कर आता है।
देश समाज और मोहल्ला मेरी हँसी उड़ाता है।
देखो सरकारी कर्मचारी कैसे फटे हाल जाता है।
सारी उम्र गंवा दी हमने घर से दफ्तर आने जाने में।
क्या पता जिंदगी बीतेगी सरकार के दिये आठ आने में।
कहता हूँ "अर्जुन" तुम भी जीने के कुछ इंतज़ाम करो
थोड़ा -थोड़ा बचा के रखो खुद को न बदनाम करो।।
-Arjun Allahabadi