Hindi Quote in Story by Rajesh Maheshwari

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याचना गृह

सूर्योदय हो रहा था। रात की कालिमा धीरे धीरे छूट रही थी। मैं रेल्वे स्टेशन पर गाडी के आने की प्रतीक्षा कर रहा था। तभी दो हाथ मेरी ओर फैले। याचक के रूप में वे जो हाथ फैले हुए थे उनके पीछे जो व्यक्ति था उसके पैर खराब हो चुके थे और उसकी आंखे भी खराब लग रही थी। मैने पर्स निकालकर यथासंभव पैसे उसे दिए और आगे बढ गया। मेरे पीछे ही एक पति पत्नी आ रहे थे उन्होंने उस भिखारी को अपना सारा भोजन दे दिया। उन्होंने उसे कुछ रूपए भी दिए।
कुछ दिनो के उपरांत नगर में एक याचनागृह का निर्माण हुआ। वह निर्माण उन्ही दंपत्ति ने करवाया था जिन्होंने उस याचक को भोजन दिया था। इस याचनागृह में भिखारियों के रहने की व्यवस्था की गई थी और उन्हें जीवन की आवश्यक सभी सुविधाएँ उपलब्ध थी। इसके साथ ही उस याचनागृह में अगरबत्ती निर्माण, पंचर ठीक करने और सिलाई कढाई जैसे अनेक प्रशिक्षणों की व्यवस्था की गई थी जिससे वहाँ रहने वाले अपने पैरों पर खडे हो सके।
मैंने उस दंपति से मुलाकात की उनका मत था कि भीख मांगना राष्ट्र की अस्मिता पर चोट है। इससे समाज में हीन भावना फैलती है। उस याचनागृह में निर्मित वस्तुओं को बाजार में व्यापारियों को बेचा जाता था। इससे उस याचना गृह में रह रहे भिखारियों की भीख मांगने की प्रवृत्ति जाती रही और वे स्वरोजगार प्राप्तकर आत्मनिर्भर हो गए।
एक दिन उस दंपति में से पति की मृत्यु हो गई। उनकी अंतिम इच्छा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार उसी याचना गृह में किया गया। वही पर उनकी समाधि बना दी गई। आज भी लोग वहाँ पहुंचकर श्रद्धा सुमन अर्पित करते है और समाज हित में कार्य करने की प्रेरणा प्राप्त करते है।

Hindi Story by Rajesh Maheshwari : 111714957
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