हर लम्हा भाग रही हूँ मै ये कैसा जनून है।
न ज़ेहन चैन मे है न दिल को सकून है।।
कैसे मेरे ये हालात हो कर रह गये है
दमड़ी भी नहीँ मेरे अपने वजूद मैं
आता है खुद पर ही रोना सुब-ओ-शाम
किससे करूँ शिकवा-ए-ज़िंदगी सरेआम
भागा करूँ मैं कब तलक यूँ गमो की राह मैं
दूर दूर तलक नहीँ आरही मन्ज़िल निगाह मैं।
हर सुबह आस का चिराग उम्मीद से जलाती हूँ।
रात होते ही मायूसी के अंधरे मैं डूब जाती हूँ।
जूनून ज़िद पर अड़ा उड़ान भरने को
हालात ने परों को जाने कहाँ छुपा रखा है
दिल-ओ-ज़हन मे आजकल बेहद झगड़ा है
इस पसोपेश से कैसे खुद को मै निकालूँ--
✏-----Benazir Ali-----👈