माँ
वह थी अंधेरी रात
हो रही थी बरसात
रह रह कर होती चमक
और गरजते हुए बादल
पैदा कर रहे थे सिहरन।
गायब थी बिजली,
हाथ को नही सूझ रहा था हाथ
घुप्प अंधियारे मे वह उठी
दबे पांव आई मेरे पास
अपने कोमल हाथों से मुझे छूकर
उसने किया कुछ समझने का प्रयास।
फिर वह भरी बरसात में
सारी भयानकता से बेपरवाह
जाने कहाँ चली गई।
कुछ देर बाद
पानी से तरबतर भीगी हुई
वह लौटकर आई
आकर उसने मुझे दवा खिलाई
फिर वह चली गई
कपडे बदले और बदन सुखाने
अब जाकर उसे
अपना ध्यान आया था
अभी तक तो उसे अपनी
सुधि ही कहाँ थी।
वह मेरी माँ
मेरी महान माँ थी।