乁मेरे मन की बातㄏ
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क्या है ज़िन्दगी के हिस्से,जो अनगिनत किस्सों में तब्दील हो चुके हैं/या हो रहें हैं।
मैं जितना भी इन हिस्सों के किस्सों से दूर जाना चाहती हूं, उतनी ही इनकी और खींची जा रही हूं_
अजब सा दौर हैं चल तो रही हूं सुनसान सड़क पर न जाने फिर किसका भय हैं/
अजीब सी बात हैं और इस तरह फड़फड़ा रहा मन बावरा हुए जा रहा हैं!