मृत्यु (भाग-२)
मृत्यु को शायद खुद से हुई हानि का कभी ज्ञान हुआ ही नहीं.. शायद इसलिए उसने फिर पूछा.. और??
मैंने गालों पर लुढ़कते आँसुओं को छुपाने की चेष्ठा से धरती को पैर के नाखून से कुरेदते हुए कहा.. जब कोई बिन कुछ कहे अचानक चला जाता है ना तो बहुत सारे सवाल दिल में उठते हैं, मगर उनके जवाब किसी के पास नहीं होते। जब खुद का दिमाग खुद से ही हारने लगता है तब बहुत बेचैनी होती है। लगता है दिमाग फट जाएगा, दिल थम जाएगा। जब आँसू आँखों में ही सूख जाते हैं, तो सख़्त पपड़ी बन जाते हैं, जिसकी चुभन उम्र भर आँखों में रहती है। दिल में दबी बातें जो कल पर टाल दी थीं वो बातों का श्मशान बनाने लगती हैं दिल में। जब लोग सवाली नज़रों से देखते हैं तो खुद की पूरी देह दिमाग़ से जंग करने लगती है और यह अंतर्द्वंद गहरा होता जाता है।
आवाज़ हिचकी बने इससे पहले मैं कहते-कहते रुक गई और खुद को नोच मृत्यु की ओर देखा..
वो अवाक हो बस मुझे देख रही थी..
मैंने पड़ोस के घर की ओर इशारा करते हुए कहा..
वो रोना, चीखना, चिल्लाना, देख रही हो.. वो आजीवन चलेगा, केवल लोगों को सुनाई नहीं देगा।
मैं चुप हो गई तो उसने मेरी ओर देखा, कुछ क्षण रुकी फिर बिन कुछ कहे जाने लगी।
उसकी चाल पहले से धीमी थी। शायद आज उसे भार महसूस हुआ हो खुद का.. वो नहीं जानती की मृत्यु का भार आजीवन जीवित देह उठाती है।
💔
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